सीखना और सिखाना

बुधवार, 19 जनवरी 2022

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत एवं प्रमुख शब्द

 जीन पियाजे का प्रमुख तीन सिद्धांत :–


 [1]–    भाषा एवं विचार का सिद्धांत



 [2]–      नैतिक विकास का सिद्धांत




 [3]–    संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत





 जीन पियाजे के अनुसार : –


 "  बच्चा नन्हा वैज्ञानिक है अपने ज्ञान की रचना खुद करता है। "



 पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत :–


 प्रमुख बिंदु:–


 #:–         संज्ञानात्मक विकास पर गहन अध्ययन करनेकी वजह से पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का  जनक भी कहा जाता है ।



 #:–      जीन पियाजे ने अपने ही 3 बच्चों पर लगभ 30 वर्षों तक गहन अध्ययन किया इसलिए उनका अध्ययन सबसे प्रभावी माना जाता है ।



 #:–      पियाजे के सिद्धांत को संज्ञानात्मक रचनात्मक व निर्मित वाद भीकहते हैं ।



 #:–        पियाजे का विकास संज्ञानात्मक निर्मित वाद                          कहलाता है ।



 #:–     पियाजे के अनुसार बच्चे अनुकूलन व सीखते हैं ।



 #:–     पियाजे के सिद्धांत में चार चरण है जिन्हें गुणात्मक चरणों में आगे बढ़ाया गया है ।



 #:–     किसी भी चरण को ना तो छोड़ा जा सकता है और ना ही चरणों का क्रम बदला जा सकता है ।



 प्रमुख चरण :–


 संवेदी गामक / संवेदी पेशी / इंद्री जनित / इंद्री गामक अवस्था    (जन्म से 2 वर्ष ) :–


 –    वस्तु स्थायित्व


 –  मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार –  हंसना रोना बोलना


 –    अनुकरण –   मा ,पा ,दा


 –     स्मृति आधारित अधिगम एवं मानसिक निरूपण


 –इंद्री आधारित अधिगम



 प्राक संक्रियात्मक अवस्था :– ( 2 से 7 वर्ष)


 –    अविलोमियता


 –       संरक्षण का भाव


 –       केंद्रीकरण


 –     जीववाद


 –     गिनती / वर्णमाला /  क्रम आदि का शुरुआत


 –     दूसरों के दृष्टिकोण को समझ पाने में असफ


 –     अहमकेंद्रिता



 मूर्त / ठोस संक्रियात्मक चरण :–  ( 7 से 11 वर्ष )


 –      विलोमीयता


 –      संरक्षण


 –        केद्रीयकरण


 –            श्रंखला


 –              गणितीय संक्रिया  (+,/,*,–)


 –         वर्गीकरण


 –              क्रम परिपक्व


 –        तार्किकता की शुरुआत – कार्य  करण


 –          समानता एवं अंतर




 औपचारिक अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था :– (11 से 15 वर्ष  या  11+ )



 –      अमूर्त चिंतन


 –   अपसारी चिंतन


 –    परिकल्पना आत्मक चिंतन


 –  तार्किक चिंतन




 नोट :–


 पियाजे के अनुसार बच्चे के सीखने के लिए उसके वातावरण के साथ खुद के अनुभव जरूरी है ना कि समाज ।



 पुस्तक का नाम :–    द सायकोलॉजी आफ अ चाइल्ड




 [2]–     भाषा एवं विचार का सिद्धांत :–


 #-    अहम केंद्रित भाषा


 1–      शैशवावस्था


 2–            एक तरफा


 #-       सामाजिकृत भाषा


 1–     बाल्यावस्था से शुरू


 2–        दो तरफा



 विचार भाषा से पहले :–


 जैसे – तुम एक जानवर हो इस वाक्य में यह पता नहीं चलता कि किसी व्यक्ति पर निर्दयता का आरोप लगाया गया या वास्तव में जानवर की बात की गई है अर्थात वाक्य की भाषा महत्वपूर्ण नहीं है ,  बल्कि इसके पीछे का विचार महत्वपूर्ण है ।




 [3]–    पियाजे का नैतिक विकास का सिद्धांत :–


 पूर्व नैतिक अवस्था (0 से 5 वर्ष )  :–


 सही या गलत की जानकारी नहीं होती है बच्चे में कोई नैतिकतानहीं होती है



 पराधीन विष्मांगी नैतिकता (5 से 10 ) :–


 नैतिकता निश्चित है इसे बदला नहीं जा सकता है


 जैसे :- जीव को मारना पाप होता है



 स्वतंत्र / परिस्थितगत / सापेक्ष नैतिकता :–


 नैतिकता जरूरत के अनुसार बदली जा सकती है इस अवस्था में


 नोट:–


 जीन पियाजे के इस नैतिकता के सिद्धांत को " द मोरल जजमेंट आफ चाइल्ड " नामक पुस्तक से लिया गया है जो कि जीन पियाजे के द्वारा लिखी गई है



 जीन पियाजे के द्वारा बताए गए महत्वपूर्ण शब्द:–


 स्कीमा (SCHEMA ) / योजना :–


 पियाजे के अनुसार बच्चे की सूचनाओं का भंडार गृह जहां वह अपनी सूचनाएं सहेज कर एक निश्चित योजना एवं क्रम के अनुसार रखता है उसे स्कीमा कहते हैं।



 अनुकूलन (ADAPTATION )  :–


 किसी भी प्रकार की जानकारी को जरूरत या  वातावरण के अनुसार ढालना अनुकूलन कहलाता है।



 अनुकूलन दो प्रकार समझा जा सकता है–


 समावेशन / आत्मसातीकरण / असिमिलेशन  (ASSIMILATION ) :–


 पुरानी सूचना में नई सूचना को बिना किसी अवरोध के जगह देना असिमिलेशन कहलाता है या समावेशन कहलाता है



 जैसे :–


 –         उड़ने वाले पक्षियों में कौवा की बात तोते को भी                       शामिल करना



 –    हर पक्षी को कौवा समझना



 समायोजन / अकोमोडेशन (ACCOMODATION ) :–


 नई जानकारी के कारण पुरानी जानकारी की गलत हो जाने पर यह विरोधाभास पैदा होने पर जानकारी को फिर व्यवस्थित करना समायोजन या अकोमोडेशन कहलाता है



 जैसे :–


 काला केवल कौवा है यह याद करने के बाद कोयल देखने पर आवाज के आधार पर अंतर करना ।



 साधारण / संतुलन / साम्यकरण (EQUILLIBRIUM ) :–


 जब बच्चे की सूचनाओं में कोई भी विरोध नहीं होता उसे संतुलन कहेंगे ।



 संक्रिया :–


 किसी वस्तु या आकृति को बिगाड़ कर पहले जैसा करने का प्रयास करना संक्रिया कहलाती है ।



 जैसे :–


 एक बच्चा अपने खिलौनों को पहले तोड़ता है  बाद में पुणे उसी प्रकार जोड़ने का प्रयास करता है ।


 जीव वाद (सजीवता ) :–


 बच्चे आसपास की वस्तुओं एव खिलौनों को जीवित समझ कर भ्रमित हो जाते हैं ।


 मूल प्रवित्यात्मक  व्यवहार:–


 जन्मजात व्यवहार जैसे हंसना रोना आदि ।


 परावर्ती प्रत्यावर्ती क्रिया (REFLEX ACTION ) :–


 बच्चे जिस कार्य को सीख लेते हैं , उसी को बार-बार करके आनंदित होते हैं ।


 अविलोमियता / विलोमियता का अभाव / अनुत्क्रमणशीलता :–


 एक बार शुरुआती बिंदु से आगे निकल जाने पर बालक शुरुआती बिंदु पर वापस नहीं आ पाता इसे  अविलोमियता का सिद्धांत कहते हैं ।


 संरक्षण का अभाव / विकेंद्रीकरण आकृति :–


 मूल आकर तुम्हें थोड़ा सा फेरबदल होने पर बच्चा मूलांक रितु को भूल जाता है यह समय छड़ का भाव है ।


 लेकिन आकृति को याद रखना क्यों संरक्षण है ।


 केंद्रीकरण:–


 किसी वस्तु या घटना को सिर्फ एक संकुचित तरीके से              समझना को  केंद्रीकरण कहते हैं ।


 महत्वपूर्ण प्रश्न :–

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