बुधवार, 19 जनवरी 2022
लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक / रूढ़ीवादी / परंपरावादी का सिद्धांत क्या क्यों कैसे UPTET/CTET/SUPPER TET
अधिगम / पढ़ना / सीखना कब क्या कैसे
वातावरण :–
अधिगम के लिए आवश्यक तत्व :–
विद्यार्थी का पूर्व ज्ञान :–
तत्परता :–
अभ्यास:–
रुचि :–
पुरस्कार या पुनर्बलन :–
अंतः क्रिया :–
गतिविधि आधारित अधिगम :–
कक्षा का वातावरण :–
शिक्षण विधि :–
शिक्षक का स्वभाव :–
पाठ्यवस्तु की प्रकृति :–
विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
दिव्यांगों की शिक्षा , ब्रेल लिपि , प्रकार , विशेष प्रबंध , विशेष प्रावधान
दिव्यांगता के प्रकार :–
दिव्यांग जनों के अधिकार अधिनियम ने दिव्यांगता के कुल 21 प्रकार बताए हैं –
दिव्यांगता में शारीरिक रूप से दिव्यांग बालक
दृष्टि बाधित बालक
पूर्ण रूप से दृष्टि बाधित बालक
श्रवण दृष्टि दोष युक्त बालक
मूक बधिर बालक
हकलाने तुतलाने वाले बालक
कम सुनने वाले बालक इत्यादि को शामिल किया जाता है ।
दिव्यांगों की शिक्षा के लिए विशेष प्रबंध :–
1– पिछले कुछ वर्षों में दिव्यांग जनों की शिक्षा एवं रोजगार के अवसरों में भारतीय सरकार ने कई प्रशंसा करने योग्य प्रयास किए हैं ।
2– खासकर 2016 में लाए गए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम को लगाने के बाद इनकी शिक्षा और रोजगार को सरकार ने गंभीरता से लिया है ।
3– लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारत में दिव्यांग जनों की शिक्षा में अभी भी काफी खामियां हैं ।
दिव्यांगों की शिक्षा के विशेष प्रावधान :–
1 – शारीरिक रूप से दिव्यांग बालक :–
ऐसे दिव्यांगों में केवल शारीरिक दिव्यांगता होती है ऐसे बालकों को कक्षा में बैठने के लिए उचित बैठक व्यवस्था दें उन्हें पूरी तरह से सामान्य कक्षा में समावेशित किया जा सकता है सरकारी जिला चिकित्सालय में ऐसे बालकों को दिव्यांगता का परीक्षण करके उन्हें प्रमाण पत्र भी दिया जाता है तथा वे स्कूल आराम से जा सके उसके लिए 3 पहिया वाहन भी मुफ्त में भी प्रदान किया जाता है ।
2– दृष्टि बाधित बालक :–
इस समूह में दो प्रकार के बालक आते हैं –
A– साफ ना देख पाने वाले बालक अधिक दृष्टि दोष वाले बालक :–
ऐसे बालकों को या तो साफ देखने में सहायक चश्मे प्रदान करें या फिर कक्षा में इन्हें आगे बढ़ाएं जिला चिकित्सालय समय-समय पर विद्यालयों में कैंप लगाकर ऐसे बालकों की आंखों की जांच कर के उपचार एवं मुफ्त में चश्मा प्रदान करता है ।
B – पूर्ण रूप से अंधे बालक :–
ऐसे बालकों को ब्रेल लिपि की सहायता से सिखाया जाता है ब्रेल लिपि के आविष्कारक फ्रांस के लुइस ब्रेल हैं भारतीय ब्रेल लिपि में कुल 6 बिंदु होते हैं ।
3 – श्रवण दृष्टि दोष युक्त बालक :–
इनको भी दो भागों में बांटा जाता है –
A – कम सुनने वाले बालक :–
ऐसे बालक जो सुनते तो हैं पर उन्हें कम सुनने वाले बालक या आंशिक श्रवण क्षमता वाले बालक कहा जाता है ऐसे बालकों को आवाज बढ़ा कर सुनाने वाली मशीन या करण यंत्र दिया जाए या फिर इन्हें कक्षा म आगे बैठाया जाए ।
B – मूक बधिर बालक :–
वे बालक जो बिल्कुल भी नहीं सुन सकते हैं ऐसे बालकों को मूक बधिर बालक कहा जाता है ऐसे बालकों को ऐसी जगह बैठाये जहां से यह शिक्षक को अच्छे से देख सके वैसे इनके लिए संकेत भाषा का बेहतर प्रयोग किया जाता है ।
4– हकलाने या तुतलाने वाले बालक :–
हकलाना तुतलाना कोई बीमारी नहीं है बल्कि विकार है इस समय रहते दूर किया जा सकता है खासकर हकलाने वाले बालकों के लिए संवर्धित वाक ( Prolonged Speech )। की व्यवस्था की गई है ।
दिव्यांगजन अधिनियम 2016 के कुछ प्रमुख प्रावधान :–
1 – सरकारी नौकरियों एवं शैक्षिक क्षेत्र में आरक्षण पाने के लिए न्यूनतम 40 % दिव्यांगता मानकों के अनुसार होनी चाहिए ।
2 – इस अधिनियम से सरकारी नौकरियों में दिव्यांगों का आरक्षण 3% से बढ़ाकर 4% कर दिया गया है और शिक्षा में यह आरक्षण 5 % करने का प्रावधान है ।
3 – इस अधिनियम के द्वारा दिव्यांगों के लिए सुगम्य पुस्तकालय की स्थापना की गई है जैसे दिव्यांगजन ऑनलाइन मोड से गुणवत्ता युक्त पुस्तकों का अध्ययन कर सकते हैं ।
4 – सरकार द्वारा चलाई जा रही स्वालंबन योजना द्वारा 2022 तक 25 लाख दिव्यांग छात्रों एवं व्यक्तियों को कौशल प्रशिक्षण दिया जाना है ।
दिव्यागों से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्न और उत्तर
अधिगम के वक्र ।। अधिगम का पठार
अधिगम वक्र की परिभाषा :–
स्किनर :–
अलेक्जेंडर :–
गेट्स :–
अधिगम के वक्र :–
अधिगम का वक्र अधिगमी के सीखने की गति या उन्नति दिखाता है जिससे हम यह जान सकते हैं कि किसी अधिगमी को दिए गए कार्य को निश्चित समय पूरा करने के लिए कितनी तेजी से काम किया है ।
अधिगम वक्र के प्रकार :–
1– समान या सरल वक्र :–
| सरल वक्र |
नतोदर / घनात्मक वक्र / बढ़ता निष्पादन वक्र :–
जैसे :–
परीक्षा के समय – तेज4 – मिश्रित वक्र :–
जैसे:–
अवस्था शारीरिक विकास
अधिगम के पठार :–
पठार की विशेषताएं :–
पठार की परिभाषाएं :–
रॉस :–
स्किनर :–
रेक्स एवम नाइट :–
अधिगम के पठार को दूर करने के उपाय :–
स्पियरमैन का G तत्व ( G Factor ) सिद्धांत & अधिगम का स्थानांतरण और प्रकार
स्पीयरमैन का G तत्व ( G Factor ) का सिद्धांत :–
अधिगम का स्थानांतरण :–
अधिगम स्थानांतरण के सिद्धांत :–
थार्नडाइक का स्थानांतरण का समान अवयव का सिद्धांत :–
कोहलर ( सुलतान ) का अधिगम स्थानांतरण का आरोपण का सिद्धांत :–
चार्ल्स वुड का अधिगम स्थानांतरण का सामान्यीकरण (उभयनिष्ठ का तत्व का सिद्धांत ) :–
अधिगम स्थानांतरण के प्रकार :–
1 – शून्य या जीरो स्थानांतरण :–
2 – नकारात्मक स्थानांतरण :–
3 – सकारात्मक या धनात्मक स्थानांतरण :–
4 – ऊर्ध्वाधर या लंबवत स्थानांतरण :–
नोट :– हर ऊर्ध्वाधर स्थानांतरण सकारात्मक स्थानांतरण जरूर होगा लेकिन हर सकारात्मक स्थानांतरण ऊर्ध्वाधर हो यह जरूरी नहीं है ।
5 – क्षैतिज स्थानांतरण :–
6– पार्श्विक स्थानांतरण :–
7 – द्विपार्श्विक स्थानांतरण :–
जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत एवं प्रमुख शब्द
जीन पियाजे का प्रमुख तीन सिद्धांत :–
[1]– भाषा एवं विचार का सिद्धांत
[2]– नैतिक विकास का सिद्धांत
[3]– संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत
जीन पियाजे के अनुसार : –
" बच्चा नन्हा वैज्ञानिक है अपने ज्ञान की रचना खुद करता है। "
पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत :–
प्रमुख बिंदु:–
#:– संज्ञानात्मक विकास पर गहन अध्ययन करनेकी वजह से पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक भी कहा जाता है ।
#:– जीन पियाजे ने अपने ही 3 बच्चों पर लगभ 30 वर्षों तक गहन अध्ययन किया इसलिए उनका अध्ययन सबसे प्रभावी माना जाता है ।
#:– पियाजे के सिद्धांत को संज्ञानात्मक रचनात्मक व निर्मित वाद भीकहते हैं ।
#:– पियाजे का विकास संज्ञानात्मक निर्मित वाद कहलाता है ।
#:– पियाजे के अनुसार बच्चे अनुकूलन व सीखते हैं ।
#:– पियाजे के सिद्धांत में चार चरण है जिन्हें गुणात्मक चरणों में आगे बढ़ाया गया है ।
#:– किसी भी चरण को ना तो छोड़ा जा सकता है और ना ही चरणों का क्रम बदला जा सकता है ।
प्रमुख चरण :–
संवेदी गामक / संवेदी पेशी / इंद्री जनित / इंद्री गामक अवस्था (जन्म से 2 वर्ष ) :–
– वस्तु स्थायित्व
– मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार – हंसना रोना बोलना
– अनुकरण – मा ,पा ,दा
– स्मृति आधारित अधिगम एवं मानसिक निरूपण
–इंद्री आधारित अधिगम
प्राक संक्रियात्मक अवस्था :– ( 2 से 7 वर्ष)
– अविलोमियता
– संरक्षण का भाव
– केंद्रीकरण
– जीववाद
– गिनती / वर्णमाला / क्रम आदि का शुरुआत
– दूसरों के दृष्टिकोण को समझ पाने में असफ
– अहमकेंद्रिता
मूर्त / ठोस संक्रियात्मक चरण :– ( 7 से 11 वर्ष )
– विलोमीयता
– संरक्षण
– केद्रीयकरण
– श्रंखला
– गणितीय संक्रिया (+,/,*,–)
– वर्गीकरण
– क्रम परिपक्व
– तार्किकता की शुरुआत – कार्य करण
– समानता एवं अंतर
औपचारिक अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था :– (11 से 15 वर्ष या 11+ )
– अमूर्त चिंतन
– अपसारी चिंतन
– परिकल्पना आत्मक चिंतन
– तार्किक चिंतन
नोट :–
पियाजे के अनुसार बच्चे के सीखने के लिए उसके वातावरण के साथ खुद के अनुभव जरूरी है ना कि समाज ।
पुस्तक का नाम :– द सायकोलॉजी आफ अ चाइल्ड
[2]– भाषा एवं विचार का सिद्धांत :–
#- अहम केंद्रित भाषा
1– शैशवावस्था
2– एक तरफा
#- सामाजिकृत भाषा
1– बाल्यावस्था से शुरू
2– दो तरफा
विचार भाषा से पहले :–
जैसे – तुम एक जानवर हो इस वाक्य में यह पता नहीं चलता कि किसी व्यक्ति पर निर्दयता का आरोप लगाया गया या वास्तव में जानवर की बात की गई है अर्थात वाक्य की भाषा महत्वपूर्ण नहीं है , बल्कि इसके पीछे का विचार महत्वपूर्ण है ।
[3]– पियाजे का नैतिक विकास का सिद्धांत :–
पूर्व नैतिक अवस्था (0 से 5 वर्ष ) :–
सही या गलत की जानकारी नहीं होती है बच्चे में कोई नैतिकतानहीं होती है
पराधीन विष्मांगी नैतिकता (5 से 10 ) :–
नैतिकता निश्चित है इसे बदला नहीं जा सकता है
जैसे :- जीव को मारना पाप होता है
स्वतंत्र / परिस्थितगत / सापेक्ष नैतिकता :–
नैतिकता जरूरत के अनुसार बदली जा सकती है इस अवस्था में
नोट:–
जीन पियाजे के इस नैतिकता के सिद्धांत को " द मोरल जजमेंट आफ चाइल्ड " नामक पुस्तक से लिया गया है जो कि जीन पियाजे के द्वारा लिखी गई है
जीन पियाजे के द्वारा बताए गए महत्वपूर्ण शब्द:–
स्कीमा (SCHEMA ) / योजना :–
पियाजे के अनुसार बच्चे की सूचनाओं का भंडार गृह जहां वह अपनी सूचनाएं सहेज कर एक निश्चित योजना एवं क्रम के अनुसार रखता है उसे स्कीमा कहते हैं।
अनुकूलन (ADAPTATION ) :–
किसी भी प्रकार की जानकारी को जरूरत या वातावरण के अनुसार ढालना अनुकूलन कहलाता है।
अनुकूलन दो प्रकार समझा जा सकता है–
समावेशन / आत्मसातीकरण / असिमिलेशन (ASSIMILATION ) :–
पुरानी सूचना में नई सूचना को बिना किसी अवरोध के जगह देना असिमिलेशन कहलाता है या समावेशन कहलाता है
जैसे :–
– उड़ने वाले पक्षियों में कौवा की बात तोते को भी शामिल करना
– हर पक्षी को कौवा समझना
समायोजन / अकोमोडेशन (ACCOMODATION ) :–
नई जानकारी के कारण पुरानी जानकारी की गलत हो जाने पर यह विरोधाभास पैदा होने पर जानकारी को फिर व्यवस्थित करना समायोजन या अकोमोडेशन कहलाता है
जैसे :–
काला केवल कौवा है यह याद करने के बाद कोयल देखने पर आवाज के आधार पर अंतर करना ।
साधारण / संतुलन / साम्यकरण (EQUILLIBRIUM ) :–
जब बच्चे की सूचनाओं में कोई भी विरोध नहीं होता उसे संतुलन कहेंगे ।
संक्रिया :–
किसी वस्तु या आकृति को बिगाड़ कर पहले जैसा करने का प्रयास करना संक्रिया कहलाती है ।
जैसे :–
एक बच्चा अपने खिलौनों को पहले तोड़ता है बाद में पुणे उसी प्रकार जोड़ने का प्रयास करता है ।
जीव वाद (सजीवता ) :–
बच्चे आसपास की वस्तुओं एव खिलौनों को जीवित समझ कर भ्रमित हो जाते हैं ।
मूल प्रवित्यात्मक व्यवहार:–
जन्मजात व्यवहार जैसे हंसना रोना आदि ।
परावर्ती प्रत्यावर्ती क्रिया (REFLEX ACTION ) :–
बच्चे जिस कार्य को सीख लेते हैं , उसी को बार-बार करके आनंदित होते हैं ।
अविलोमियता / विलोमियता का अभाव / अनुत्क्रमणशीलता :–
एक बार शुरुआती बिंदु से आगे निकल जाने पर बालक शुरुआती बिंदु पर वापस नहीं आ पाता इसे अविलोमियता का सिद्धांत कहते हैं ।
संरक्षण का अभाव / विकेंद्रीकरण आकृति :–
मूल आकर तुम्हें थोड़ा सा फेरबदल होने पर बच्चा मूलांक रितु को भूल जाता है यह समय छड़ का भाव है ।
लेकिन आकृति को याद रखना क्यों संरक्षण है ।
केंद्रीकरण:–
किसी वस्तु या घटना को सिर्फ एक संकुचित तरीके से समझना को केंद्रीकरण कहते हैं ।
महत्वपूर्ण प्रश्न :–
वाइगोत्सकी का सामाजिक सांस्कृतिक विकास का सिद्धांत
सिद्धांत के अन्य नाम :–
#- सामाजिक-संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत
#- सामाजिक संरचना/ निर्मित वाद का सिद्धांत
#- विकास सामाजिक अंतः क्रिया का परिणाम है|
महत्वपूर्ण बिंदु- सामाजिक अंतः क्रिया
वाइगोत्सकी के प्रमुख शब्द -
[1]- ज्यादा ज्ञानी दूसरा (more knowledge other)-M.K.O
बच्चा उसी व्यक्ति से सीखेगा जो उससे ज्यादा जानकार हो-
जैसे - माता–पिता, शिक्षक ,ज्यादा बुद्धिमान सहपाठी इत्यादि|
[2] – नजदीकी या समीपस्थ या संभावित विकास का क्षेत्र–
Zone of Proximal Development–(ZPD):
एक बच्चे द्वारा समस्या समाधान के दौरान खुद से शुरूआंत करने के बाद बीच में उलझ जाने पर वन्हा से लक्ष्य की दूरी के बीच का खाली स्थान (क्षेत्र) जिसे वयस्क की सहायता से भरा जा सकता है उसे ZPD कहते है।
NOTE–
ZPD में दी गई सहायता के बीच में दी गई" स्थाई " सहायता होती है।
[3]– स्कैफोल्डिंग / ढांचा निर्माण / मचान /(SCAFFOLDING) :
समस्या के दौरान शुरुआत में वयस्क द्वारा दी गई "अस्थाई "सहायता स्कैफोल्डिंग कहलाती है।
जैसे– चलना सीखने की शुरुआत के दौरान माता-पिता का बच्चे को उंगली पकड़कर चलना सिखाना।
[4]– भाषा विचार से पहले :
#– वाइगोत्सकी के अनुसार– शुरुआत के 2 वर्षों तक बालक में भाषा एवं विचार अलग-अलग होते हैं फिर भी भाषा विचार स पर हावी होती है।
#– विचार का प्रकटीकरण 2 वर्षों बाद शाब्दिक भाषा के उदय के बाद आसान हो जाता है अतः भाषा विचार के पहले ।
#– वाइगोत्सकी ने बच्चों को खुद से बातें करने की आदत को" व्यक्तिगत वाक / वार्ता " ( Private Speech ) कहां है।
कुछ प्रमुख बिंदु–
वाइगोत्सकी की प्रसिद्ध पुस्तक –
( LANGUAGE OF THOUGHT) लैंग्वेज ऑफ थॉट
#– वाइगोत्सकी के सिद्धांत में " खेल " का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।
#– वाइगोत्सकी के अनुसार – बच्चे अपने संवयस्को "अंतः क्रिया " करके सीखते हैं।
नोट–
अगर दिए गए प्रश्न का कर्ता बच्चा है , तो उत्तर " समीपस्थ ( ZPD ) " होगा ।
लेकिन अगर वयस्क है , तो उत्तर "सहायता या सहयोग "देना होगा।











