सीखना और सिखाना

बुधवार, 19 जनवरी 2022

लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक / रूढ़ीवादी / परंपरावादी का सिद्धांत क्या क्यों कैसे UPTET/CTET/SUPPER TET


 

लॉरेंस कोहलबर्ग ( नैतिक दुविधा ) :–

   –   कोहल बर्ग एक जर्मन अमेरिकन मनोवैज्ञानिक थे ।

   –  उनका अध्ययन हिंज नामक व्यक्ति पर आधारित था ।

  –  कोहल वर्ग का प्रयोग 10 से 16 वर्ष के लड़कों पर किया गया ।

  – कोहल वर्ग के अनुसार विकास नैतिक विकास सीधी रेखा में नहीं होता बल्कि  "नैतिक तर्कना " का परिणाम होता है ।जिसका एक भाग है " नैतिक दुविधा " है ।



       नैतिक विकास के चरण :–

   [1] – पूर्व नैतिक / पूर्व रूढ़िवादी / पूर्व परंपरावादी चरण :–

   ( 3 से 10 वर्ष ) 

                    महत्वपूर्ण बिंदु  – नैतिक दुविधा

       ( A ) –  अहमकेंद्रित स्वार्थी बच्चा
                     जैसे– सारी आइसक्रीम मुझे दो ।

       ( B ) –  दंड एवम आज्ञापलन
                    जैसे– राम को भी खिलौना दो नही कूटे जाओगे

नोट:–     पहली अवस्था में बच्चे की स्वतंत्र इच्छा तथा माता-                   पिता के नियंत्रण की बीज नैतिक दुविधा बनती है ।
       
   –       इस अवस्था में नैतिकता का अभाव रहता है तथा नैतिकता                 वाह कारको से आती है ।

    [2] – नैतिक / रूढ़िवादी / परंपरावादी अवस्था 

              ( 10 से 13 वर्ष ) :–

                          नैतिक दुविधा

         ( A ) –  अच्छा लड़का अच्छी लड़की अवस्था ( अनुकरण )
                     जैसे– उनके बेटे जैसे बनो ।

          ( B ) –  कानून व्यवस्था अवस्था

               जैसे– वैधानिक नियमों को मानते हुए आत्मनिर्भरता                               मैं अपना निर्णय खुद लूंगा ।

          उत्तर नैतिक / उत्तर परंपरावादी / उत्तर रूढ़िवादी चरण :–

                    ( 13 से 16 वर्ष )

                                  नैतिक दुविधा

         ( A ) –  सामाजिक अनुबंध

                       जैसे– अपना अपना भला करना ।

          ( B ) –  सार्वभौमिक नैतिकता

                      जैसे– सभी का भला हो चाहे मेरा भला ना हो 
                                उसे खिलाओ मैं भूखा रह लूंगा ।

           महत्वपूर्ण बिंदु क्या क्यों कैसे :–

– लारेंस कोहलबर्ग का सिद्धांत उनकी पुस्तक  " द साइकोलॉजी आफ मोरल डेवलपमेंट "  ( THE PSHYCOLOGY OF MORAL DEVELOPMENT ) से ली गई है ।

         – कोहल बर्ग ने अपने सिद्धांत सांस्कृतिक अंतर को महत्व दिया  ।

उन्होंने अपने प्रयोग में महिलाओं को या बालिकाओं को शामिल नहीं किया है इसलिए इनकी इस सिद्धांत की आलोचना इसी अनुरूप से की जाती है ।

      कोहल वर्ग के अनुसार नैतिक तर्कना एवं नैतिक व्यवहार के बीच गहरा संबंध है ।


      
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अधिगम / पढ़ना / सीखना कब क्या कैसे


 

वातावरण :–

                                           अधिगम के लिए उपयुक्त वातावरण जरूरी है क्योंकि प्रत्येक वातावरण में अधिगम संभव नहीं है इस अध्याय में हम अधिगम के लिए उपयुक्त वातावरण में महत्वपूर्ण तत्व या बिंदुओं के ऊपर विचार रखेंगे जो कि अधिगम या शिक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं ।

    अधिगम के लिए आवश्यक तत्व :–

                     विद्यार्थी का पूर्व ज्ञान :–

       अगर अधिगम या पढ़ने के दौरान नवीन ज्ञान को विद्यार्थी के पूर्व ज्ञान से जोड़कर प्रस्तुत किया जाए तो विद्यार्थी के लिए सीखना आसान होगा और अधिगम के लिए उचित वातावरण का सृजन होगा जिससे बालक अपने ज्ञान का दूसरे ज्ञान में उपयोग कर सकता है ।

   तत्परता :–

                               रुचि जिज्ञासा तथा पूर्व ज्ञान से जोड़कर अगर विद्यार्थी को अधिगम के दौरान मानसिक रूप से तैयार किया जाए तो ऐसे में अधिगम प्रभावशाली रहेगा तथा अधिगम के लिए उचित वातावरण का निर्माण होगा जिससे बालक किसी चीज को नहीं सीखना चाहता है तब भी वह सीख लेता है अगर अच्छे वातावरण का निर्माण हो जाता है तो ।

                   अभ्यास:–

         अगर अधिगम में विद्यार्थी को सीखे के अधिगम को अभ्यास मिलना लाने को बीच-बीच में कहा जाए तो विस्मृति की संभावना कम होगी और अधिगम के लिए उपयुक्त वातावरण बनेगा जिससे बालक अपने पूर्व को याद करता रहेगा और उसकी संभावनाएं व्यक्त होती रहेगी जिससे वह आगे पढ़ने के लिए और उपयुक्त समझेगा ।

          रुचि :–

                                   उचित अधिगम माहौल के लिए यह जरूरी है कि शिक्षक की योग्यता को आधार नामांकन विद्यार्थी की रुचि को वरीयता दी जाए इससे अधिगम के लिए उचित वातावरण बनेगा और बच्चे के अनुरूप उसको शिक्षा मिल पाएगी जिसके लिए वह रुचि रखता हो उसी प्रकार की शिक्षा उसे दी जाए ताकि वह भविष्य में जाकर अपनी रूचि के अनुसार ज्ञान की प्राप्ति कर सके और जीवन कौशल को बढ़ावा दे सके ।

      पुरस्कार या पुनर्बलन :–

      अच्छा प्रदर्शन अगर पुरस्कृत या पुनर्बलन किया जाता है तो अधिगम अगली बार और बेहतर करने का प्रयास करता है और अधिगम के लिए उचित वातावरण का सृजन होता है जिससे बालक को एक सकारात्मक दिशा मिलती है इस सकारात्मक का प्रयोग करके और सृजनशील बालक बन सकता है ।

       अंतः क्रिया :–

     कक्षा में अगर अधिगम के दौरान शिक्षक शिक्षार्थियों कीमत अगर विचारों का आदान-प्रदान मुक्त ढंग से होता है तो विद्यार्थी बिना किसी डर या भाई के अपना भ्रम दूर कर सकता है और ऐसे अधिगम के लिए उचित माहौल तैयार होता है इससे बालक और शिक्षक के बीच में एक सामंजस्य बना रहता है और अंतरिया के द्वारा दोनों एक दूसरे से सीख लेते रहते हैं ।

       गतिविधि आधारित अधिगम :–

      अगर अधिगम में करके सीखने की सुविधा हो तो यह आस्था एवं व्यवहारिक ज्ञान होगा और इससे अधिगम के लिए उचित माहौल तैयार होगा जो कि बच्चे के अंदर एक स्थाई ज्ञान और व्यवहारिक जीवन से जुड़ी हुई बातों को पढ़ाया जाता है जिससे व्यवहार में उसके परिवर्तन होता है और ज्ञान में वृद्धि होती है ।

       कक्षा का वातावरण :–

     अगर कक्षा में समानता सहानुभूति समूह भावना सहकारिता जैसे गुण पाए जाते हैं तो अधिगम के लिए उचित माहौल बनेगा बच्चे एक दूसरे से सामाजिक बनाकर रहते हैं जिसके कारण बच्चों में एक घृणा की भावना नहीं होती है का सामान जैसे आ जाता है तो पढ़ाई में दिक्कत आने लगती है ।

      शिक्षण विधि :–

      अगर शिक्षण विधि बच्चे की उम्र क्षमता ग्रहण शक्ति आदि के अनुकूल हो तो ऐसे में अधिगम के लिए उचित वेतन का निर्माण होगा वह शिक्षक को हमेशा बच्चे के अनुरूप शिक्षा देनी चाहिए वह जिस प्रकार की गतिविधि करता हो या उस उसकी मानसिक स्थिति जिस प्रकार उसी प्रकार की उसको शिक्षा दी जाए ।

            शिक्षक का स्वभाव :–

      अगर शिक्षा का स्वभाव सहानुभूति और मित्रवत व्यवहार से युक्त हो तो अधिगम के लिए उचित वातावरण का निर्माण होगा जिससे बच्चे और शिक्षक के बीच में एक सामंजस्य बन जाता है।

     पाठ्यवस्तु की प्रकृति :–

        अगर विषय वस्तु बच्चे की उम्र कहां शक्ति और क्षमता के अनुकूल हो तो विद्यार्थी भली-भांति सीख पाएगा और अधिगम के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण होगा जिससे बच्चा अपने उम्र के अनुरूप ही शिक्षा ग्रहण कर सकता है 

     विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर 


      Question
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दिव्यांगों की शिक्षा , ब्रेल लिपि , प्रकार , विशेष प्रबंध , विशेष प्रावधान

 दिव्यांगता के प्रकार :–

दिव्यांग जनों के अधिकार अधिनियम ने दिव्यांगता के कुल 21 प्रकार बताए हैं –


          दिव्यांगता में शारीरिक रूप से दिव्यांग बालक 

      दृष्टि बाधित बालक

      पूर्ण रूप से दृष्टि बाधित बालक

      श्रवण दृष्टि दोष युक्त बालक 

      मूक बधिर बालक

      हकलाने तुतलाने वाले बालक 

       कम सुनने वाले बालक इत्यादि को शामिल किया जाता है ।




     दिव्यांगों की शिक्षा के लिए विशेष प्रबंध :–

      1– पिछले कुछ वर्षों में दिव्यांग जनों की शिक्षा एवं रोजगार के अवसरों में भारतीय सरकार ने कई प्रशंसा करने योग्य प्रयास किए हैं ।


2– खासकर 2016 में लाए गए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम को लगाने के बाद इनकी शिक्षा और रोजगार को सरकार ने गंभीरता से लिया है ।


  3– लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारत में दिव्यांग जनों की शिक्षा में अभी भी काफी खामियां हैं ।



   दिव्यांगों की शिक्षा के विशेष प्रावधान :–


  1 – शारीरिक रूप से दिव्यांग बालक :–

             ऐसे दिव्यांगों में केवल शारीरिक दिव्यांगता होती है ऐसे बालकों को कक्षा में बैठने के लिए उचित बैठक व्यवस्था दें उन्हें पूरी तरह से सामान्य कक्षा में समावेशित किया जा सकता है सरकारी जिला चिकित्सालय में ऐसे बालकों को दिव्यांगता का परीक्षण करके उन्हें प्रमाण पत्र भी दिया जाता है तथा वे स्कूल आराम से जा सके उसके लिए 3 पहिया वाहन भी मुफ्त में भी प्रदान किया जाता है ।


 2– दृष्टि बाधित बालक :–


            इस समूह में दो प्रकार के बालक आते हैं –


   A– साफ ना देख पाने वाले बालक अधिक दृष्टि दोष वाले बालक :–

                    ऐसे बालकों को या तो साफ देखने में सहायक चश्मे प्रदान करें या फिर कक्षा में इन्हें आगे बढ़ाएं जिला चिकित्सालय समय-समय पर विद्यालयों में कैंप लगाकर ऐसे बालकों की आंखों की जांच कर के उपचार एवं मुफ्त में चश्मा प्रदान करता है ।


  B – पूर्ण रूप से अंधे बालक :–

           ऐसे बालकों को ब्रेल लिपि की सहायता से सिखाया जाता है ब्रेल लिपि के आविष्कारक फ्रांस के लुइस ब्रेल हैं भारतीय ब्रेल लिपि में कुल 6 बिंदु होते हैं ।


    3 – श्रवण दृष्टि दोष युक्त बालक :–

    इनको भी दो भागों में बांटा जाता है –


   A – कम सुनने वाले बालक :–

      ऐसे बालक जो सुनते तो हैं पर उन्हें कम सुनने वाले बालक या आंशिक श्रवण क्षमता वाले बालक कहा जाता है ऐसे बालकों को आवाज बढ़ा कर सुनाने वाली मशीन या करण यंत्र दिया जाए या फिर इन्हें कक्षा म आगे बैठाया जाए ।


  B – मूक बधिर बालक :–

           वे बालक जो बिल्कुल भी नहीं सुन सकते हैं ऐसे बालकों को मूक बधिर बालक कहा जाता है ऐसे बालकों को ऐसी जगह बैठाये जहां से यह शिक्षक को अच्छे से देख सके वैसे इनके लिए संकेत भाषा का बेहतर प्रयोग किया जाता है ।



   4– हकलाने या तुतलाने वाले बालक :–

             हकलाना तुतलाना कोई बीमारी नहीं है बल्कि विकार है इस समय रहते दूर किया जा सकता है खासकर हकलाने वाले बालकों के लिए संवर्धित वाक ( Prolonged Speech )। की व्यवस्था की गई है ।



   दिव्यांगजन अधिनियम 2016 के कुछ प्रमुख प्रावधान :–



1 – सरकारी नौकरियों एवं शैक्षिक क्षेत्र में आरक्षण पाने के लिए न्यूनतम 40 % दिव्यांगता मानकों के अनुसार होनी चाहिए ।


 2 – इस अधिनियम से सरकारी नौकरियों में दिव्यांगों का आरक्षण 3% से बढ़ाकर 4% कर दिया गया है और शिक्षा में यह आरक्षण 5 % करने का प्रावधान है ।


  3 – इस अधिनियम के द्वारा दिव्यांगों के लिए सुगम्य पुस्तकालय की स्थापना की गई है जैसे दिव्यांगजन ऑनलाइन मोड से गुणवत्ता युक्त पुस्तकों का अध्ययन कर सकते हैं ।


4 – सरकार द्वारा चलाई जा रही स्वालंबन योजना द्वारा 2022 तक 25 लाख दिव्यांग छात्रों एवं व्यक्तियों को कौशल प्रशिक्षण दिया जाना है ।

      दिव्यागों से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्न और उत्तर 


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अधिगम के वक्र ।। अधिगम का पठार

 

         अधिगम वक्र की परिभाषा :–


स्किनर :–


             अधिगम का वक्र किसी दी गई क्रिया में उन्नति या अवनति            का ग्राफ पेपर पर प्रदर्शन है ।

अलेक्जेंडर :–

                           जब अधिगम के आंकड़ों  वर्गीकृत ग्राफ पेपर पर                       प्रदर्शित किया जाता है तो अधिगम का वक्र कहलाता                        है ।

गेट्स :–

                    अधिगम का वक्र अधिगम में होने वाली गति और                               प्रगति को व्यक्त करता है ।



 अधिगम के वक्र :–


अधिगम का वक्र अधिगमी के सीखने की गति या उन्नति दिखाता है जिससे हम यह  जान सकते हैं कि किसी अधिगमी को  दिए गए कार्य को निश्चित समय पूरा करने के लिए कितनी तेजी से  काम किया है ।


   अधिगम वक्र के प्रकार :–


अधिगम के मुख्य चार  (4 ) वक्र माने गए हैं –

       
        

       1–  समान या सरल वक्र  :–



इसमें अधिगमी के सीखने की गति हमेशा एक जैसी होती है क्योंकि यह मनुष्य के लिए संभव नहीं है इसलिए इसे आदर्श यह असंभव वक्र भी कहा जाता  है ।


सरल वक्र




   नतोदर    / घनात्मक वक्र /  बढ़ता निष्पादन वक्र :–


  जब शुरू में अधिगम की गति धीमी और बाद में तेज हो तो   नतोदर वक्र बनेगा ।

 धनात्मक  वक्र  ।





उन्नतोदर / ऋनात्मक वक्र / घटता निष्पादन वक्र :–

जब शुरू में अधिगम की गति तेज और बाद में धीमी हो जाए तो यह  उन्नतोदर वक्र  कहलाएगा ।

जैसे :–

परीक्षा के समय   –  तेज 

और परीक्षा के बाद।  – धीमी


   

   4 –  मिश्रित वक्र :–


         जब सीखने की गति असमान हो तो ऐसे में मिश्रित रोककर बनेगा  ।

जैसे:–


      अवस्था                                    शारीरिक विकास

शैशवावस्था                                    तेज

बाल्यावस्था                                     धीमी

किशोरावस्था                                   तेज

प्रौढ़ावस्था।                                     धीमी


   

 अधिगम के पठार :–

जब अधिगम के दौरान अधिगम में थकावट , दुर्घटना , रूचि या प्रेरणा की कमी , निद्रा , खराब शिक्षण विधि आदि के कारण कुछ समय के लिए सीखना रोक देता है तो ऐसे उसके वक्र की रेखा  के ऊपर या नीचे जाने के बजाय थोड़े समय के लिए एक सीधी रेखा बन जाती है इसे अधिगम का पठार कहते हैं  ।

1 – वक्र
2 –  सामान्य प्रक्रिया
3 –  पठार हमेशा के लिए नहीं होता है
4 –  पठार अधिगम में रुकावट दिखाता है
5 –  पठार सार्वभौमिक है ।


पठार की विशेषताएं :–


1 –  पठार बनना एक सामान्य प्रक्रिया है इसे गलतियां भूल नहीं माना जाना चाहिए ।

2 –  पठार सभी बनाते हैं अतः यह एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है ।

3 –  अलग से नहीं बनता है वह अधिगम के वक्र का ही हिस्सा है ।

4 –  कोई भी पठार हमेशा के लिए नहीं बनता ।

5 –  पठार अधिगम में आई रुकावट को दिखाता है ना की समाप्ति ।

पठार की परिभाषाएं :–


रॉस :–

               पठार सीखने की प्रक्रिया की प्रमुख विशेषता है जो सीखने             के दौरान उस अवधि को दिखाता है जब सीखने की प्रक्रिया               में कोई उन्नति नहीं होती है ।

स्किनर :–

                     पठार क्षैतिज प्रसार है इससे सीखने की क्रिया का                      प्रत्यक्ष बोध नहीं होता है । 

रेक्स एवम  नाइट :–


                                   अधिगम के पठार तब बनते हैं जब व्यक्ति                       सीखने की एक अवस्था में आकर दूसरी अवस्था में                     प्रवेश करता है ।

    अधिगम के पठार को दूर करने के उपाय :–


1 :–  थकावट आने पर पर्याप्त आराम करने पर ।

2 :–  दुर्घटना या बीमारी के बाद पुनः स्वस्थ होकर ।

3 :–   विषय वस्तु को रोचक बना कर ।

4 :–  शिक्षण विधि को बदलकर ।

5 :–  कक्षा में बेहतर या बाल केंद्रित शिक्षण सामग्री अपना कर ।

6 :–  विद्यार्थियों में जिज्ञासा पैदा करके ।

 महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर





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स्पियरमैन का G तत्व ( G Factor ) सिद्धांत & अधिगम का स्थानांतरण और प्रकार

 

 स्पीयरमैन का G तत्व ( G Factor ) का सिद्धांत :–


स्पीयर मैन के अनुसार G कारक हमें सभी मानसिक कार्यों में सहायता करता है इसलिए सिर्फ G कारक का ही स्थानांतरण होगा ।
 
  S कारक प्रत्येक व्यक्ति का समान नहीं है अतः दूसरा स्थानांतरण नहीं होगा ।

            G कारक                           S कारक

              जन्मजात                           अर्जित

              सार्वभौमिक                         खास विशिष्ट

           मात्रा में अलग – अलग                 प्रकार एवम मात्रा

                Ex –                                      Ex–

           तर्क शक्ति  , ग्रहण शक्ति                    वकील , वैज्ञानिक



         

अधिगम का स्थानांतरण :–


एक जगह सीखे गए अधिगम का दूसरी जगह प्रयोग करना या दूसरे अधिगम में सहायक होना अधिगम का स्थानांतरण कहलाता  है ।

अधिगम स्थानांतरण के सिद्धांत :–

थार्नडाइक का  स्थानांतरण का समान अवयव का सिद्धांत :–

पहले और बाद के अधिगम में जहां तक समानता होगी स्थानांतरण सिर्फ वही तक होगा ।

Ex–     A B C       समान तत्व      A B C D

कोहलर (  सुलतान ) का अधिगम स्थानांतरण का आरोपण का सिद्धांत :–


प्रयोग संख्या = 1                      प्रयोग संख्या = 2

छड़ी संख्या = 1                        छड़ी की संख्या = 2

पहले और बाद में अधिगम में जितने तत्व समान होंगे आरोपण सिर्फ वही तक माना जाएगा ।

चार्ल्स वुड का अधिगम स्थानांतरण का सामान्यीकरण  (उभयनिष्ठ का  तत्व का सिद्धांत ) :– 


पहले और बाद के अधिगम में जो तत्व उभयनिष्ठ हो स्थानांतरण से फोन तक होगा ।

Ex–  एक ही सूत्र पर आधारित 10 सवाल लगाने की जगह एवं सभी सूत्र को याद कर लेना  ।

     अधिगम स्थानांतरण के प्रकार :–


1 –  शून्य या जीरो स्थानांतरण :–

  
   जब पहले का अधिगम बाद के अधिगम में कोई सहायता ना करें तो शून्य स्थानांतरण होगा ।

Ex –    क्रिकेट खेलना सीकर      अंग्रेजी बोलना सीखना  ।

2 –     नकारात्मक स्थानांतरण :–


जब पहले का अधिगम बाद के अधिगम या बाद का अधिगम पहले के अधिगम में बाधा उत्पन्न करें तो इसे नकारात्मक स्थानांतरण कहेंगे ।

Ex–    पांचवी तक हिंदी माध्यम से सीखने वाले विद्यार्थी का छठवीं कक्षा से अंग्रेजी माध्यम द्वारा सीखना ।

3 –  सकारात्मक या धनात्मक स्थानांतरण :–


   जब पहले का अधिगम बाद के अधिगम में सहायक सिद्ध हो तो उसे सकारात्मक स्थानांतरण कहेंगे ।

Ex–  संस्कृत व्याकरण सीकर हिंदी व्याकरण सीखना ।

4 –  ऊर्ध्वाधर या लंबवत स्थानांतरण :–


   जब निम्न स्तर पर सीखा गया अधिगम अत्यंत उच्च स्तर पर प्रयोग कर दिया जाए तो उसे ऊर्ध्वाधर स्थानांतरण कहा जाएगा ।

Ex –    न्यूटन का सेब का गिरना देखकर गुरुत्वाकर्षण का पता लगाना ।

  नोट :– हर ऊर्ध्वाधर स्थानांतरण सकारात्मक स्थानांतरण जरूर होगा लेकिन हर सकारात्मक स्थानांतरण ऊर्ध्वाधर हो यह जरूरी नहीं है ।


5 –  क्षैतिज स्थानांतरण :–


जब दो प्रकार के अधिगम आपस में कोई भी सीधा संबंध ना रखते हो फिर भी एक का प्रयोग दूसरे में हो जाए तो इसे क्षैतिज स्थानांतरण कहते हैं ।

Ex–  गणित के सूत्रों का बहुत ही किया रसायन विज्ञान में प्रयोग ।

        रसायन = भौतिक = गणित 

         इसी को हम क्षैतिज स्थानांतरण कहते हैं ।

6–  पार्श्विक स्थानांतरण :–


      जब एक जगह सीखे गया निगम का उसी का मिलते जुलते अधिगम में इस्तेमाल हो जाए तो इसे पार्श्विक स्थानांतरण कहते हैं ।

Ex –  7 + 3 = 10 यह जानने वाले विद्यार्थी का उस प्रश्न को हल कर देना जिसमें राम के पास 7 और श्याम के पास 3 किताबें हैं और उसे कुल किताबों की संख्या बतानी है ।

7 –   द्विपार्श्विक  स्थानांतरण :–


        जब एक अन्याय क्षेत्र में सीखा गया अधिगम उसी कुशलता के साथ दूसरे अन्य क्षेत्र में निपुणता दिला दें तो विषय अधिगम का द्विपार्श्विक स्थानांतरण कहेंगे ।

Ex –  दाएं हाथ से लिखने वाले विद्यार्थी का उसी निपुणता के साथ बाएं हाथ से लिखना ।


महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर 

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जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत एवं प्रमुख शब्द

 जीन पियाजे का प्रमुख तीन सिद्धांत :–


 [1]–    भाषा एवं विचार का सिद्धांत



 [2]–      नैतिक विकास का सिद्धांत




 [3]–    संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत





 जीन पियाजे के अनुसार : –


 "  बच्चा नन्हा वैज्ञानिक है अपने ज्ञान की रचना खुद करता है। "



 पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत :–


 प्रमुख बिंदु:–


 #:–         संज्ञानात्मक विकास पर गहन अध्ययन करनेकी वजह से पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का  जनक भी कहा जाता है ।



 #:–      जीन पियाजे ने अपने ही 3 बच्चों पर लगभ 30 वर्षों तक गहन अध्ययन किया इसलिए उनका अध्ययन सबसे प्रभावी माना जाता है ।



 #:–      पियाजे के सिद्धांत को संज्ञानात्मक रचनात्मक व निर्मित वाद भीकहते हैं ।



 #:–        पियाजे का विकास संज्ञानात्मक निर्मित वाद                          कहलाता है ।



 #:–     पियाजे के अनुसार बच्चे अनुकूलन व सीखते हैं ।



 #:–     पियाजे के सिद्धांत में चार चरण है जिन्हें गुणात्मक चरणों में आगे बढ़ाया गया है ।



 #:–     किसी भी चरण को ना तो छोड़ा जा सकता है और ना ही चरणों का क्रम बदला जा सकता है ।



 प्रमुख चरण :–


 संवेदी गामक / संवेदी पेशी / इंद्री जनित / इंद्री गामक अवस्था    (जन्म से 2 वर्ष ) :–


 –    वस्तु स्थायित्व


 –  मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार –  हंसना रोना बोलना


 –    अनुकरण –   मा ,पा ,दा


 –     स्मृति आधारित अधिगम एवं मानसिक निरूपण


 –इंद्री आधारित अधिगम



 प्राक संक्रियात्मक अवस्था :– ( 2 से 7 वर्ष)


 –    अविलोमियता


 –       संरक्षण का भाव


 –       केंद्रीकरण


 –     जीववाद


 –     गिनती / वर्णमाला /  क्रम आदि का शुरुआत


 –     दूसरों के दृष्टिकोण को समझ पाने में असफ


 –     अहमकेंद्रिता



 मूर्त / ठोस संक्रियात्मक चरण :–  ( 7 से 11 वर्ष )


 –      विलोमीयता


 –      संरक्षण


 –        केद्रीयकरण


 –            श्रंखला


 –              गणितीय संक्रिया  (+,/,*,–)


 –         वर्गीकरण


 –              क्रम परिपक्व


 –        तार्किकता की शुरुआत – कार्य  करण


 –          समानता एवं अंतर




 औपचारिक अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था :– (11 से 15 वर्ष  या  11+ )



 –      अमूर्त चिंतन


 –   अपसारी चिंतन


 –    परिकल्पना आत्मक चिंतन


 –  तार्किक चिंतन




 नोट :–


 पियाजे के अनुसार बच्चे के सीखने के लिए उसके वातावरण के साथ खुद के अनुभव जरूरी है ना कि समाज ।



 पुस्तक का नाम :–    द सायकोलॉजी आफ अ चाइल्ड




 [2]–     भाषा एवं विचार का सिद्धांत :–


 #-    अहम केंद्रित भाषा


 1–      शैशवावस्था


 2–            एक तरफा


 #-       सामाजिकृत भाषा


 1–     बाल्यावस्था से शुरू


 2–        दो तरफा



 विचार भाषा से पहले :–


 जैसे – तुम एक जानवर हो इस वाक्य में यह पता नहीं चलता कि किसी व्यक्ति पर निर्दयता का आरोप लगाया गया या वास्तव में जानवर की बात की गई है अर्थात वाक्य की भाषा महत्वपूर्ण नहीं है ,  बल्कि इसके पीछे का विचार महत्वपूर्ण है ।




 [3]–    पियाजे का नैतिक विकास का सिद्धांत :–


 पूर्व नैतिक अवस्था (0 से 5 वर्ष )  :–


 सही या गलत की जानकारी नहीं होती है बच्चे में कोई नैतिकतानहीं होती है



 पराधीन विष्मांगी नैतिकता (5 से 10 ) :–


 नैतिकता निश्चित है इसे बदला नहीं जा सकता है


 जैसे :- जीव को मारना पाप होता है



 स्वतंत्र / परिस्थितगत / सापेक्ष नैतिकता :–


 नैतिकता जरूरत के अनुसार बदली जा सकती है इस अवस्था में


 नोट:–


 जीन पियाजे के इस नैतिकता के सिद्धांत को " द मोरल जजमेंट आफ चाइल्ड " नामक पुस्तक से लिया गया है जो कि जीन पियाजे के द्वारा लिखी गई है



 जीन पियाजे के द्वारा बताए गए महत्वपूर्ण शब्द:–


 स्कीमा (SCHEMA ) / योजना :–


 पियाजे के अनुसार बच्चे की सूचनाओं का भंडार गृह जहां वह अपनी सूचनाएं सहेज कर एक निश्चित योजना एवं क्रम के अनुसार रखता है उसे स्कीमा कहते हैं।



 अनुकूलन (ADAPTATION )  :–


 किसी भी प्रकार की जानकारी को जरूरत या  वातावरण के अनुसार ढालना अनुकूलन कहलाता है।



 अनुकूलन दो प्रकार समझा जा सकता है–


 समावेशन / आत्मसातीकरण / असिमिलेशन  (ASSIMILATION ) :–


 पुरानी सूचना में नई सूचना को बिना किसी अवरोध के जगह देना असिमिलेशन कहलाता है या समावेशन कहलाता है



 जैसे :–


 –         उड़ने वाले पक्षियों में कौवा की बात तोते को भी                       शामिल करना



 –    हर पक्षी को कौवा समझना



 समायोजन / अकोमोडेशन (ACCOMODATION ) :–


 नई जानकारी के कारण पुरानी जानकारी की गलत हो जाने पर यह विरोधाभास पैदा होने पर जानकारी को फिर व्यवस्थित करना समायोजन या अकोमोडेशन कहलाता है



 जैसे :–


 काला केवल कौवा है यह याद करने के बाद कोयल देखने पर आवाज के आधार पर अंतर करना ।



 साधारण / संतुलन / साम्यकरण (EQUILLIBRIUM ) :–


 जब बच्चे की सूचनाओं में कोई भी विरोध नहीं होता उसे संतुलन कहेंगे ।



 संक्रिया :–


 किसी वस्तु या आकृति को बिगाड़ कर पहले जैसा करने का प्रयास करना संक्रिया कहलाती है ।



 जैसे :–


 एक बच्चा अपने खिलौनों को पहले तोड़ता है  बाद में पुणे उसी प्रकार जोड़ने का प्रयास करता है ।


 जीव वाद (सजीवता ) :–


 बच्चे आसपास की वस्तुओं एव खिलौनों को जीवित समझ कर भ्रमित हो जाते हैं ।


 मूल प्रवित्यात्मक  व्यवहार:–


 जन्मजात व्यवहार जैसे हंसना रोना आदि ।


 परावर्ती प्रत्यावर्ती क्रिया (REFLEX ACTION ) :–


 बच्चे जिस कार्य को सीख लेते हैं , उसी को बार-बार करके आनंदित होते हैं ।


 अविलोमियता / विलोमियता का अभाव / अनुत्क्रमणशीलता :–


 एक बार शुरुआती बिंदु से आगे निकल जाने पर बालक शुरुआती बिंदु पर वापस नहीं आ पाता इसे  अविलोमियता का सिद्धांत कहते हैं ।


 संरक्षण का अभाव / विकेंद्रीकरण आकृति :–


 मूल आकर तुम्हें थोड़ा सा फेरबदल होने पर बच्चा मूलांक रितु को भूल जाता है यह समय छड़ का भाव है ।


 लेकिन आकृति को याद रखना क्यों संरक्षण है ।


 केंद्रीकरण:–


 किसी वस्तु या घटना को सिर्फ एक संकुचित तरीके से              समझना को  केंद्रीकरण कहते हैं ।


 महत्वपूर्ण प्रश्न :–

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वाइगोत्सकी का सामाजिक सांस्कृतिक विकास का सिद्धांत

 सिद्धांत के अन्य नाम :–


 #-        सामाजिक-संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत


 #-     सामाजिक संरचना/ निर्मित वाद का सिद्धांत


 #-   विकास सामाजिक अंतः क्रिया का परिणाम है|




 महत्वपूर्ण बिंदु-      सामाजिक अंतः क्रिया



 वाइगोत्सकी के प्रमुख शब्द -


 [1]-  ज्यादा ज्ञानी दूसरा (more knowledge other)-M.K.O


 बच्चा उसी व्यक्ति से सीखेगा जो उससे ज्यादा जानकार हो-


 जैसे -  माता–पिता, शिक्षक ,ज्यादा बुद्धिमान सहपाठी इत्यादि|


 [2] – नजदीकी या समीपस्थ या संभावित विकास का क्षेत्र–


 Zone of Proximal Development–(ZPD):



 एक बच्चे द्वारा समस्या समाधान के दौरान खुद से शुरूआंत करने के बाद बीच में उलझ जाने पर वन्हा से लक्ष्य की दूरी के बीच का खाली स्थान (क्षेत्र) जिसे वयस्क की सहायता से भरा जा सकता है उसे ZPD कहते है।



 NOTE–


 ZPD में दी गई सहायता के बीच में दी गई" स्थाई " सहायता होती है।



 [3]– स्कैफोल्डिंग / ढांचा निर्माण / मचान /(SCAFFOLDING) :


 समस्या के दौरान शुरुआत में वयस्क द्वारा दी गई "अस्थाई "सहायता स्कैफोल्डिंग कहलाती है।



 जैसे–   चलना सीखने की शुरुआत के दौरान माता-पिता का बच्चे को उंगली पकड़कर चलना सिखाना।



 [4]–  भाषा विचार से पहले :


 #–        वाइगोत्सकी के अनुसार– शुरुआत के 2 वर्षों तक बालक में भाषा एवं विचार अलग-अलग होते हैं फिर भी भाषा विचार स पर हावी होती है।



 #–    विचार का प्रकटीकरण 2 वर्षों बाद शाब्दिक भाषा के उदय के बाद आसान हो जाता है अतः भाषा विचार के पहले ।



 #–   वाइगोत्सकी ने बच्चों को खुद से बातें करने की आदत को" व्यक्तिगत वाक  / वार्ता  " ( Private Speech )  कहां है।



 कुछ प्रमुख बिंदु–


 वाइगोत्सकी की प्रसिद्ध पुस्तक –



 ( LANGUAGE OF THOUGHT) लैंग्वेज ऑफ थॉट




 #–         वाइगोत्सकी के सिद्धांत में " खेल " का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।


 #–         वाइगोत्सकी के अनुसार –  बच्चे अपने संवयस्को "अंतः क्रिया " करके सीखते हैं।


 नोट–


 अगर दिए गए प्रश्न का कर्ता बच्चा है , तो उत्तर " समीपस्थ ( ZPD ) " होगा ।



 लेकिन अगर वयस्क है , तो उत्तर  "सहायता या सहयोग  "देना होगा।

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