लॉरेंस कोहलबर्ग ( नैतिक दुविधा ) :–
– कोहल बर्ग एक जर्मन अमेरिकन मनोवैज्ञानिक थे ।
– उनका अध्ययन हिंज नामक व्यक्ति पर आधारित था ।
– कोहल वर्ग का प्रयोग 10 से 16 वर्ष के लड़कों पर किया गया ।
– कोहल वर्ग के अनुसार विकास नैतिक विकास सीधी रेखा में नहीं होता बल्कि "नैतिक तर्कना " का परिणाम होता है ।जिसका एक भाग है " नैतिक दुविधा " है ।
नैतिक विकास के चरण :–
[1] – पूर्व नैतिक / पूर्व रूढ़िवादी / पूर्व परंपरावादी चरण :–
( 3 से 10 वर्ष )
महत्वपूर्ण बिंदु – नैतिक दुविधा
( A ) – अहमकेंद्रित स्वार्थी बच्चा
जैसे– सारी आइसक्रीम मुझे दो ।
( B ) – दंड एवम आज्ञापलन
जैसे– राम को भी खिलौना दो नही कूटे जाओगे
नोट:– पहली अवस्था में बच्चे की स्वतंत्र इच्छा तथा माता- पिता के नियंत्रण की बीज नैतिक दुविधा बनती है ।
– इस अवस्था में नैतिकता का अभाव रहता है तथा नैतिकता वाह कारको से आती है ।
[2] – नैतिक / रूढ़िवादी / परंपरावादी अवस्था
( 10 से 13 वर्ष ) :–
नैतिक दुविधा
( A ) – अच्छा लड़का अच्छी लड़की अवस्था ( अनुकरण )
जैसे– उनके बेटे जैसे बनो ।
( B ) – कानून व्यवस्था अवस्था
जैसे– वैधानिक नियमों को मानते हुए आत्मनिर्भरता मैं अपना निर्णय खुद लूंगा ।
उत्तर नैतिक / उत्तर परंपरावादी / उत्तर रूढ़िवादी चरण :–
( 13 से 16 वर्ष )
नैतिक दुविधा
( A ) – सामाजिक अनुबंध
जैसे– अपना अपना भला करना ।
( B ) – सार्वभौमिक नैतिकता
जैसे– सभी का भला हो चाहे मेरा भला ना हो
उसे खिलाओ मैं भूखा रह लूंगा ।







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